पंचायत समीक्षा

सावधान : अभी भी वक्त है… कोरोना फिर से पसार रहा है पैर

कोरोना छत्तीसगढ़ प्रदेश रायपुर

रायपुर।।छत्तीसगढ़ के साथ ही राजधानी रायपुर में भी कोरोना का संक्रमण एक बार फिर बढ़ रहा है। काफी हद तक इस पर नियंत्रण हो जाने के बाद लोगों को लगने लगा था कि अब शायद इस महामारी से मुक्ति मिल जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एक बार फिर से कोरोना का बढ़ता दायरा यह बता रहा है कि हम जल्द ही इस गलतफहमी से बाहर आ जाएं। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो इसके परिणाम बड़े घातक होंगे। दुनिया के साथ ही इस शहर ने भी कोरोना के दर्द को खूब झेला है।

परिवार के किसी सदस्य के संक्रमित हो जाने पर किस तरह स्वजन चाहकर भी उसके दर्द में सहभागी नहीं बन पाते थे। जिन स्वजनों के दर्द में आंखों से आंसू बह निकलते थे, उन्हें ही आंखों के सामने तिल-तिल कर मरते देखा है, लेकिन वक्त के साथ सभी यह दर्द भूल गए। यह बात अच्छी भी है, क्योंकि किसी जख्म को जिंदगी भर ढोना ठीक नहीं है।

भूतकाल के बुरे दौर से उबरकर वर्तमान को संवारना ही इंसानी धर्म भी है और कर्तव्य भी, लेकिन हम यहीं चूक गए कि उस बुरे दौर की वजह को भूल गए। उससे सीख नहीं ली। कोरोना के संक्रमण से बचने के लिए बनाए गए सारे नियम-कायदों को ताक पर रखकर ढिठाई करने लगे। इसका दुष्परिणाम सामने है। अजीब दौर था। लाकडाउन लगा। दुनिया ठप-सी हो गई। लोगों ने काफी कुछ खोया। नौकरियां गईं। रोजगार चौपट हो गए।

धीरे-धीरे संभले और दुनिया फिर दौड़ने लगी, लेकिन इसके बाद जिस तरह की लापरवाहियां हुईं, वे अब भारी पड़ने जा रही हैं। इसके लिए शासन-प्रशासन को कितना जिम्मेदार ठहराएं, यह बात इतर है, लेकिन सच्चाई तो यही है कि हमने खुद ही खुद को खतरे में डाल दिया है। बाजार खुल गए। होटल-रेस्टारेंट शुरू हो गए। कार्यालयों में रौनक बढ़ गई। सड़कों पर रेला दिखने लगा। वहीं दूसरी ओर लोगों ने शारीरिक दूरी का पालन करना छोड़ दिया।

मास्क को बोझ समझने लगे। सैनिटाइजर का उपयोग औपचारिकता में बदल गया। सार्वजनिक स्थलों पर भीड़ देखकर लगता ही नहीं कि यह कोरोना के दौर से गुजर रही है। नवा रायपुर में इन दिनों चल रही रोड सेफ्टी वर्ल्ड सीरीज को ही ले लें। यहां जिस तरह से जिंदगी दांव पर लगाकर भीड़ जुट रही है, उसके लिए किसे-किसे जिम्मेदार मानें?

इस तरह की लापरवाहियां बरतने वाले लोग एक सवाल खुद से पूछें कि क्या वे कम से कम अपनों की सुरक्षा के प्रति गंभीर हैं? जवाब हम जानते हैं, लेकिन अब भी वक्त हमारे-आपके हाथ से निकला नहीं है। कहते हैं, देर आयद, दुरुस्त आयद यानी यदि अब भी हम आंखें खोल लें और सचेत हो जाएं तो कोरोना ही नहीं, किसी भी बला से पार पा सकते हैं।

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